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मुर्गे के चूजे अंडों से निकलते ही चल पड़ते हैं…

एक ओर जहां हर पक्षी की प्रजाति जहां अपने बच्चों को चलने-फिरने लायक होने तक घोंसलों में ही रखती है और मुंह में दाना देती है, वहीं मेवाड़ में पाए जाने वाले मुर्गे की झापटा (रेड स्पर फाउल) प्रजाति इन सबसे अलग है। इसके चूजे अण्डों से निकलते ही घोंसला छोड़ चलना प्रारम्भ कर देते हैं।

माता-पिता उन्हें केवल सुरक्षा देते हैं, अन्य पक्षियों की तरह चोंच में दाना नहीं। बहुत छोटे होने के बावजूद ये चूजे अपना खाना स्वयं ढूंढकर खाते हैं। खतरा होने पर झाडिय़ों या घास में छुप जाते हैं। खतरा टलने पर माता-पिता की विशेष आवाज सुनकर ही बाहर निकलते हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. सतीश कुमार शर्मा के अनुसार मेवाड़ में झापटा सघन जंगलों का निवासी छोटा मुर्गा है। इस प्रजाति के चूजों को झाडिय़ों की सफाई, जंगल की कटाई, चराई आदि से खतरा रहता है। ये पक्षी दीमकों व हानिकारक कीटों का सफाया कर वनों को सुरक्षा देते हैं।

जमीन को खोदकर कीड़े-मकोड़े ढूंढते हैं और बीज, दाने, रसीले फल एवं कीट-पतंगे आदि खाते हैं। ये मुर्गे सज्जनगढ़ में कभी-कभी दिखते हैं जबकि माउन्ट आबू, कुम्भलगढ़, टॉडगढ़-रावली, फुलवारी की नाल एवं सीतामाता अभयारण्य में अधिक पाए जाते हैं।

विज्ञान में इसेे गेलोपर्डिक्स स्पेडिसिया कहा जाता है। यह स्थानीय प्रजाति है, जिसमें चेहरे की त्वचा एवं टरंगे लाल होते हैं। सिर व गर्दन भूरे, शरीर धूसर-ललाई लिए होता है। मादा की पीठ पर चितकबरापन अधिक स्पष्ट होता है।

घरेलू मुर्गे के मुकाबले इसकी पूूंछ छोटी होती है। लडऩे के लिए पांवों पर एक की बजाय दो लम्बे व नुकीले नख होते हैं। उन्होंने बताया कि राज्य में जंगली मुर्गों की तीन प्रजातियां पाई जाती हैं-रेड स्पर फाउल, पेन्टेड स्पर तथा ग्रे जंगल फाउल।