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जानिए मिनरल वॉटर की हक़ीकत – अवशय पढ़ें व सभी को बताए

भारत में एक आम बात हो गई है कि हर आदमी नल के पानी को छोड़कर बोतल का पानी पीना चाहता है क्योंकि दावा किया जाता है कि वह ‘मिनरल वॉटर’ होता है और ‘शुद्ध’ भी होता है| बात कुछ ठीक भी लगती है क्योंकि पानी की बोतल ख़रीदने वाले हर व्यक्ति के मन में कहीं ये विश्वास ज़रूर होता है कि वह ऐसा पानी पी रहा है जो उसकी सेहत के लिए बहुत लाभदायक है| या यूँ भी कहें कि पानी की बोतलें बनाने वाली कंपनियों ने एक सुनियोजित प्रचार के ज़रिए लोगों के दिलों में ये बात बिठा दी है कि पैसे से ख़रीदकर पिया गया पानी ही सेहत के लिए ठीक है और आम नल का पानी सेहत के लिए बहुत ख़तरनाक़ है|

लेकिन क्या हो जब आपको ये पता चले कि जो पानी की बोतल आप दूध के भाव ख़रीदते हैं उस बोतल में शुद्ध जल के बजाय ऐसा पानी होता है जो सेहत के लिए किसी ज़हर से कम नहीं| आपका भरोसा हिल सकता है और यह स्वभाविक भी है क्योंकि उसकी ठोस वजह है| वजह ये है कि आमतौर पर हर दुकान, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर बिकने वाली पानी की बोतलों की जाँच में पाया गया है कि उनमें ख़तरनाक़ हद तक कीटनाशक रसायन तक मिले होती हैं| भला हो भी क्यों नहीं, आखिर एक पानी की बोतल की एक्स्पायरी डेट 6 महीने तक होती है, अब आप ही बताइये कि गंगाजल को छोड़ कर दुनिया का ऐसा कौनसा पानी है जो 6 महीने बिना कीड़े पड़े बच सकता है|

भारत के माने हुए विज्ञान और पर्यावरण केंद्र यानि सीएसई ने अनेक ब्राँडों वाली पानी की बोतलों की जाँच की| केंद्र की निदेशक सुनीता नारायण बताती हैं कि सहयोगियों में ही यह विचार सामने आया कि बाज़ार में बिकने वाली खाने की चीज़ों और पानी की बोतलों की क्यों न जाँच की जाए कि इनका स्तर क्या होता है|इसके बाद दिल्ली और मुंबई के बाज़ार में बिक रहे बोतलबंद पानी के कई नमूने जमा किए गए| ये नमूने न केवल बाज़ार से बल्कि उन फ़ैक्टरियों से भी लिए गए जहाँ पानी की बोतलें भरी जाती हैं|

पानी की इन बोतलों की जाँच प्रयोगशाला में अमरीकी तकनीक और अत्याधुनिक पद्धति और उपकरणों का इस्तेमाल करते हुए की गई| विज्ञान और पर्यावरण केंद्र के एक अन्य वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर एच बी माथुर बताते हैं कि नमूनों की कई बार और प्रामाणिक तरीक़े से जाँच की गई| निदेशक सुनीता नारायण कहती हैं, “जाँच के बाद जो जानकारी सामने आई वो बहुत ही भयानक है|”
34 नमूनों की जाँच में लगभग सभी बोतलों में मुख्य रूप से लिंडेन, डीडीटी, डीडीई, एंडोसल्फान, मेलाथियान और क्लोर पायरीफ़ोस नामक कीटनाशक सामान्य से 400 गुना अधिक मात्रा तक पाये गए| पूरी दुनिया के डॉक्टर एवं वैज्ञानिक जानते है कि डीडीटी, लिंडेन, एंडोसल्फान, मेलाथियान, क्लोर पायरीफ़ोस नामक कीटनाशकों से कैंसर बहुत व्यापक पैमाने पर होता देखा गया है| और यह बहुत चिंता की बात है कि पानी की बोतलों में कैंसर की बीमारी पैदा करने वाले रसायन मिले| ये वैज्ञानिक बताते हैं कि मुम्बई से ज्यादा दिल्ली के नमूनों में कीटनाशक रसायनों की मात्रा पाई गई| लेकिन यह हाल तो पूरे देश का है, कहीं कम, कहीं ज्यादा लेकिन कीटनाशक है तो सभी में|मिनरल वॉटर और शुद्ध पेय जल के नाम पर बेची जाने वाली बोतलों में कीटनाशक पाए गए हैं| और सब जानते हैं कि कीटनाशक मनुष्य एवं सभी जीव-जंतुओं के लिए ज़हर हैं| चौंकाने वाली बात ये है कि कीटनाशक सभी कंपनियों की बोतलों में मिले है| और हर बोतल में कीटनाशकों की मात्रा सामान्य से कई गुना तक ज्यादा मिली है|

चिंता की बात ये है कि ग़रीब आदमी भी अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा ख़र्च करके ये पानी ख़रीदता है और उसे मिलता क्या है – कैंसर का ख़तरा| यहाँ सवाल ये भी उठता है कि सरकार इस बारे में क्या कर रही है? जब तक आम आदमी की सेहत के बारे में बनाए गए नियम क़ानून और मानक लागू नहीं किए जाते, तब तक कुछ नहीं हो सकता| मुद्दा ये भी है कि पानी की बोतलें बनाने वाली कंपनियों के स्थान पर आम आदमी की सेहत का ज़्यादा ध्यान रखा जाना चाहिए|

कुछ समय पूर्व भारतीय रेल्वे ने भी रेल्वे स्टेशनों पर पेयजल की उपलब्धता एवं गुणवत्ता पर काम करने की बजाए ‘रेल नीर’ ब्रांड का बोतलबंद पानी का व्यापार आरंभ कर दिया| पिछले वर्ष सरकार ने अंग्रेजों द्वारा वर्ष 1867 में बनाया गया सराय एक्ट भी समाप्त कर दिया। इसके तहत यह बाध्यता थी कि किसी भी पड़ाव, सराय, होटल या अन्य ऐसा स्थान जहां ग्राहक आकर रूकते हों उसके मालिक को ग्राहक के लिए आते ही पानी का गिलास पेस करना होगा और उसका कोई पैसा ग्राहक से नहीं लिया जाएगा। ऐसा न करने वाले पर जुर्माने का प्रावधान था।

इस कानून के जाने को शक की निगाह से देखा जाए तो लगता है कि कहीं जानबूझ कर तो नहीं सराय कानून को मिटा दिया गया है। संदेह करने का कारण कतई स्पष्ट है कि वर्तमान में जिस प्रकार से पानी का बाजारीकरण हुआ उसमें कहीं न कहीं सराय कानून कानूनन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बिजनेस पर असर डाल रहा था। ये कम्पनियां उस प्रत्येक दरवाजे को बंद कर देना चाहती हैं जो कि इनकी कमाई के आड़े आता हो।

सराय कानून का चले जाना इसी षड़यंत्र का नतीजा है। क्योंकि प्याऊ लगाने वाली संस्कृति के देश भारत को सराय एक्ट से नई उर्जा मिली थी कि हमारी एक संस्कृति को अंग्रेजों द्वारा कानूनन भी बाध्य कर दिया गया है। लेकिन आजाद देश के हमारे कर्णधारों उसी संस्कृति को मिटाने के लिए उतारू हैं। आखिर ऐसा क्या नुकसान हो जाता अगर सराय कानून बना रहता? आखिर कौन सा पहाड़ टूट पड़ता अगर इस कानून को निरस्त नहीं किया जाता, लेकिन भविष्य के बड़े बिजनेस पर निगाह गड़ाए बैठी कम्पनियों की नजर में यह कानून खटक रहा था।

हमने इस कानून से अपनी संस्कृति को जोड़ लिया था लेकिन कानून की सख्ताई समाप्त होने पर हम संस्कृति से भी हाथ न धो बैठें।

About the author

Laxman Hada

I am a freelance writer and blogger that specializes in Health and tech content. I studied at the University of Delhi and am now on the Delhi,India. I frequently blog about writing tips to help students do better on their work.

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