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दिवाली का आगमन नएपन का प्रतीक होता है, लेकिन आपके घर की दराजों से निकला अनचाहा और पुराना सामान भी किसी के लिए नया हो सकता है, क्योंकि कई चीजें पुरानी भले ही हों, इतनी टूटी-फूटी भी नहीं होतीं कि इन्हें कचरे में फेंक दिया जाए। आपके दरवाजे से विदा लेने वाला यही सामान किसी दूसरे द्वार की शोभा बढ़ाने का उपयुक्त साधन बन सकता है। इन्हें आपको किसी पुराना सामान खरीदने वाली वेबसाइट पर भी नहीं बेचना है, बल्कि ऐसे पात्र तलाशने हैं, जो आपके स्नेह से मिले सामान में अपनी उपयोगिता का खजाना ढूंढ लें।

दिवाली का मतलब है सफाई। सफाई यानी घर से कई गैर जरूरी चीजों की विदाई, लेकिन सवाल यह है कि ये वस्तुएं क्या यूं ही कूड़े के ढेर में फेंक दी जाएं या फिर औने-पौने दामों में बेचकर इनसे मुक्ति पा ली जाए? ठहरिए जरा, एक रास्ता और भी है। सोचिए तो कि आपके घर से निकला कबाड़ किसी के लिए जीवन की जरूरत का जुगाड़ हो सकता है। जो चीज एक घर के लिए पुरानी है, वो दूसरे आशियाने के लिए रौनक बन सकती है।
जो चीजें आपके घर को बेतरतीब रखती थीं, वो किसी दूसरे घर के लिए सुंदर सजावट बन सकती हैं। इसीलिए दिवाली के त्योहार पर घर की सफाई में निकले सामान को केवल कबाड़ न समझें। थोड़ी-सी कोशिश इस दिशा में करें कि इसे उन लोगों तक पहुंचाया जाए, जो वाकई इन्हें पाकर खुश होंगे। पल भर ठहरकर विचारिए तो, आपके घर से निकला पुराना-सा पड़ चुका सामान तमाम तरह की दुश्वारियों में जी रहे लोगों की जिंदगी को नए रंग दे सकता है, उनके लिए सहूलियत का सबब बन सकता है।
कपड़े, किताबें, जूते या घरेलू सामान। तो कितना कुछ होता है, जो दिवाली की साफ-सफाई में घरों से विदा कर दिया जाता है। ऐसे में यही सामान किसके और कैसे काम आ सकता है, यह सोचकर इसे वहां तक पहुंचाने की भी सोची जाए। सबसे पहले तो आपके घर से निकलने वाला पुराना सामान अनुपयोगी है, यह सोचना बंद कर दें, क्योंकि ये वस्तुएं किसी और के लिए मूलभूत जरूरतों को पूरा करने वाली भी हो सकती हैं। कहते भी हैं कि अक्सर किसी एक द्वारा दी गई छोटी से छोटी चीज दूसरे की जिंदगी में बहुत बड़ा महत्व रख सकती है। जरूरत भी हो सकती है और सुविधा भी। वह कुछ न कुछ उपयोगिता जरूर रखती है। बस जरूरत केवल इस बात की है कि वह वस्तु वहां पहुंच जाए, जहां उसका उपयोग हो सके। ऐसा बहुत सहजता से किया जा सकता है। यूं सहज भाव से देना भी आत्मसंतोष, प्रसन्नता और आंतरिक सुख देता है। जरा सोचिए, कचरा बनाकर परिवेश को गंदा करने वाले इन्हीं सामानों में कितना कुछ किसी की जरूरत का सामान भी हो सकता है।
हमारे ही समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी ऐसा है, जिसे आज भी पुराने सामान की कद्र होती है। उनका इतना सामर्थ्य नहीं होता कि वे नया सामान खरीद सकें। इसीलिए आपके लिए बेकार-बेमोल हो चुकी चीजें उनके लिए अनमोल होती हैं, स्नेहपूर्वक मिले किसी खजाने की तरह। हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत, दोनों में ही अभावग्रस्त लोगों के लिए कुछ करने की परंपरा की महिमा बताई गई है। माना गया है कि सहृदयता और सहायता करने की सोच के साथ किसी जरूरतमंद को कुछ देने का ही अर्थ दान है। नया पुराना जो आप दे सकें। यानी जो वस्तु स्वयं की इच्छा से दी जाएं और साथ ही जिसे दी जा रही हैं, उसके भी काम आएं। जिस व्यक्ति को कुछ दिया जाता है, उसे दान का पात्र कहते हैं।
दान सुपात्र को ही दिया जाए, यह बात हमारे धर्मग्रंथों में तो वर्णित है ही, एक  व्यावहारिक विचार भी है, क्योंकि यह सोच ही मन को शांति देने वाली है कि किसी जरूरतमंद की सहायता की। आज से समय में जब समाज में हर ओर असमानता और असंवेदनशीलता देखने को मिल रही है, यह मानवीय सोच बहुत मददगार साबित हो सकती है। आपके घर से निकली चीजें भी अगर किसी के अभावग्रस्त जीवन को बेहतर बना सकें तो इससे अच्छा क्या हो सकता है? सोचना बस इतना है कि घर में मौजूद चीजों को हटाकर जिस तरह आप अपने आंगन का कायाकल्प करेंगीं, ये साजो-सामान किसी और की छत तले पहुंचकर उसका आंगन भी तो सजा देगा।
घर से कबाड़ को विदा करने का एक पहलू यह भी है कि इससे किसी जरूरतमंद की मदद तो होगी ही, आपको सुकून की सौगात मिलेगी। ढेर सारा फर्नीचर, अनावश्यक किताबें, बर्तन और कई अन्य तरह के सामान हमारे दिमाग में भारीपन लाते हैं। जो गैर जरूरी चीजें घर के कोने-कोने को घेरे रहती हैं, वे उलझन, थकान और क्रोध को बढ़ाती हैं। इसका नकारात्मक असर हमारे व्यवहार पर भी पड़ता है। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के शोध के मुताबिक, कबाड़ का हमारी मनोस्थिति और आत्मसंतुष्टि पर बहुत विपरीत असर पड़ता है। यह निर्जीव सामान हमें किसी काम पर फोकस करने में बड़ी बाधा बनता है।
इसीलिए खयाल इस बात का भी रखना है कि घर के कोने-कोने से समेटकर इकट्ठा किया गैर जरूरी सामान फिर किसी कोने में ही न समेट दिया जाए। पुराने सामानों को सहेज कर रखने का मोह हम सभी को होता है। कभी भावनात्मक लगाव तो कभी आलस के चलते घर का हर हिस्सा ऐसी चीजों से अट जाता है, जो शायद ही कभी काम आएं। इसीलिए न केवल बड़े दिवाली की सफाई और सामान की छंटाई में लगें, बल्कि बच्चों से भी कहें कि कोई भी चीज, कपड़ा, किताबें या खिलौना, जो वे काम में नहीं लाते हैं, अपने कमरे से हटा दें। उन्हें यह भी बताएं कि ऐसे सामान को इकट्ठा कर जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाया जाएगा। इसमें बच्चों में यह समझ विकसित होगी कि उनके लिए क्या सहेजना जरूरी है और क्या उन्हें घर से बाहर निकालना है।

 

 

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Ashok Kumar

I am a freelance writer and blogger that specializes in Tech and gadgets. I studied at the University of Ajmer and am now on theDelhi. I frequently blog about writing tips to help students do better on their work.

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