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वास्तु टिप्स – घर में पूजा का स्थान कहाँ होना चाहिए

हर धर्म में सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत पूजन स्थल का निर्माण किया जाता है। स्थान का अभाव होने के कारण व्यक्ति सार्वजनिक पूजा स्थल का निर्माण तो कर रहा है मगर व्यक्तिगत पूजा स्थल अपने निवास स्थान पर ही बना लेता है। पूजा क्या है ? पूजा क्यों करनी चाहिए ? पूजा कैसे करनी चाहिए ? अपने निवास स्थान पर पूजा का स्थान कहाँ होना चाहिए? विश्व में अलग—अलग पंथ हैं अलग— अलग विधियाँ हैं। इन सब बातों को सूक्ष्म रूप में बताने का प्रयास कर रहा हूँ।

धर्म करत संसार सुख, धर्म करत निर्वाण।

धर्म पंथ साधे बिना, नर तिर्यञ्च समान।।(अज्ञात)

इन दो पंक्तियों में ही धर्म का सार बता दिया गया है।

पूजा क्या है— परमपिता परमात्मा अलग—अलग धर्म में अलग—अलग नामों से पूजे जाते हैं। सनातन धर्म वाले परमात्मा को ब्रह्मरुप में मानते हैं। जैन मतावलंबी सिद्ध के रूप में मानते हैं। इस्लाम को मानने वाले अल्लाह के नाम से इबादत करते हैं। क्रिश्चियन गॉड के नाम से याद करते हैं। सभी सम्प्रदाय वालों की मान्यता एक ही है इनका कोई आकार नहीं है निराकार हैं, विश्व व्यापी हैं। मूल विषय की जानकारी प्रदान करने के लिए उपरोक्त जानकारी देना आवश्यक है।

घर में पूजा स्थान कहाँ होना चाहिए —
अपने घर, बंगले, कोठी या फ्लैट में पूजा स्थल का उपयुक्त स्थान ईशान कोण माना गया है। ईशान कोण का मतलब ईश्वर का स्थान। सदबुद्धि का स्थान, शांति का स्थान। सकारात्मक ऊर्जाओं को प्राप्त करने का स्थान। नारद पुराण में ईशान कोण को गुरु बृहस्पति की दिशा मानी गयी है। सुजान पुरुषों को ईशान कोण में परमात्मा के लिए पूजन का स्थान बनाना चाहिए। पूजन का स्थान बनाते समय विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। उस स्थान का निर्माण भारी— भरकम पत्थरों से न बनायें। अच्छे वृक्ष की लकड़ी से निर्माण करावें। पूजा स्थान के अगल—बगल, उपर—नीचे लेट्रीन (बाथरुम) का स्थान न हो। परमात्मा के स्वरूप की प्रतिमा को उत्तर या पूर्व मुखी रखने का निर्देश शास्त्रों में मिलता है एवं प्रचलन में भी यही देखने को मिल रहा है। नारद—पुराण में पश्चिम की ओर मुँह करके प्रतिमा रखने को श्रेष्ठ बताया है।

[box type=”info” align=”aligncenter” ]ब्रह्माविष्णुशिवेन्द्रभास्करगुहा: पूर्वापरास्या: शुभा:। प्रोक्तौ सर्वदिशामुखौ शिवजिनौ विष्णुर्विधाता तथा। चामुण्डाग्रहमातरो धनतिद्र्धैमातुरो भैरवो व देवो दक्षिणदिङ्गमुख: कपिवरा नैर्ऋत्यवक्त्रो भवेत् ।।[/box]
(वास्तुराजवल्लभे)

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, सूर्य, कार्तिकेय की पूर्व अथवा पश्चिम मुख स्थापना करें अथवा शिव,जिन, विष्णु, ब्रह्मा इनका मुख किसी भी दिशा में किया जा सकता है। सूर्यादि ग्रह, चामुण्डा, मातृगण, कुबेर, गणेश, भैरव की स्थापना दक्षिण मुख तथा हनुमान जी की नैऋत्य मुख स्थापना करें।

पुराणों के कथा अनुसार सूर्योदय से ९० मिनट पहले का समय ब्रह्म मुहूर्त कहलाता है। ऐसी मान्यता है— रात्रि में चाँद और तारों से निकलने वाला अमृत पृथ्वी पर परत के रूप में फैल जाता है इस समय शिक्षा, धर्म कार्य, स्वास्थ्य, दान, देव पूजन के लिए अति उत्तम है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उत्तम माना गया है। पूजा करने का श्रेष्ठ समय ब्रह्म मुहूर्त बताया गया है।

पुञ्चस्वेतेषु शौचेषु, मन: शौच: विशिष्यते ।
पूजन स्थान पर प्रवेश करने के लिए एवं पूजन करने के लिए शरीर और वस्त्र की शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। शरीर पर धूल लगी हुई हो, कपड़े भी धूल से सने हुए हो तो आध्यात्मिक ऊर्जाओं को ग्रहण करने में बाधा उत्पन्न होगी। पूजन स्थल में प्रवेश करने के लिए शरीर एवं वस्त्र की शुद्धता जरुरी है। पूजन के स्थान पर नंगे पैर खड़े होकर या जमीन पर बैठकर पूजा करने से हमारे शरीर में उत्पन्न शरीर में उत्पन्न अध्यात्मिक तरंगे भूमि के संपर्व से भूमि में समा जाती है।

आसन पर ही खड़े होकर या बैठकर पूजा करनी चाहिए। पूजन की दो पद्धतियाँ अनादिकाल से प्रचलित हैं। एक द्रव्य पूजन एवं भाव पूजन। भाव पूजन और मानसिक पूजन एक ही शब्द के पर्यावाची शब्द हैं। पूजन करते समय परमात्मा के समक्ष सम्मान पूर्वक जो द्रव्य चढ़ाया जाता है वह द्रव्य या सामग्री अच्छी होनी चाहिए। सामथ्र्य न होने पर सामग्री कम लायें मगर उत्तम गुणवाली लायें। समय एवं आर्थिक परिस्थितियाँ साथ न दे उस परिस्थिति में भाव पूजन (मानसिक पूजन) भाव सहित कर लेना ही श्रेष्ठ है।

परमात्मा के लिए आपके द्वारा चढ़ाये गये नैवेद्य, दीप, धूप, फल, फूल इत्यादि से अधिक आपके भाव, श्रद्धा— समर्पण का अधिक महत्व है। इसलिए कहा गया है भाव पावन आचरो। ईशान कोण में पूजन एवं मंत्रों आदि का उच्चारण, घंटे की आवाज, शंखध्वनि दीपक—कपूर के द्वारा आहुतियाँ इत्यादि क्रियाओं से उस भवन के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जाओं की उत्पत्ति होने लगती है। जहाँ सकारात्मक भाव होते हैं वहाँ शांति और समृद्धि होती है। पूजन करने से आदमी का आत्मबल मजबूत होता है।

आत्मबल एवं सकारात्मक सोच आपके जीवन को आगे बढाने में निरन्तर सहायक होता है। आत्मबल, धार्मिक शक्ति, सकारात्मक ऊर्जाएँ एवं सकारात्मक सोच आपको मंजिल तक पहुँचाने में सहायक होती है। समय—समय क्या करता है समय यूँ ही निकल जायेगा। कुछ समय निकाल ले परमात्मा के लिए वो तेरे काम आयेगा।

 

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Prakash Bengani

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